Sunday, August 27, 2017

देहगंध (कहानी)

वो इत्र की शीशी को दाहिने हाथ में लेती है और अपने बाएं हाथ की तरफ धीरे से बढ़ा देती है ,हथेली को उल्टा करके रुई के फाहे से उसपर खुशबू बिखेर लेती है और उस हाथ को अपनी नाक के पास ले जाकर सूँघती है और फिर खुशबू को सूंघते ही उसके चेहरे पर ऐसे भाव आते हैं जैसे किसी अजनबी से इस आस में मिली हो कि वो कोई अपना ही है पर मिलते ही अजनबीपन का अहसास हो गया हो...
उसने इत्र की दुकान वाले को दो इत्र की शीशी के पैसे दिए और इत्र हाथ मे लिए बाहर की तरफ बढ़ गई,तभी दुकानदार ने कहा "बेटा बुरा न मानो तो एक बात पूछू?" लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा जी चाचा पूछिये न"
बेटा तुम कितने ही दिनों से हर सप्ताह यहाँ आती हो जाने कितनी ही खुशबुएँ सूँघती हो और 1,2 शीशी इत्र लेकर चली जाती हो पर तुम्हे  कभी इत्र को सूंघते ही खुश होते नहीं देखा किसके लिए ले जाती हो ये इत्र"
लड़की लंबी सांस लेकर मुस्कुरा देती है आह भरते हुए आंखों में उतार आए समंदर को रोक लेने की कोशिश करते हुए कहती है "मैं इत्र में खुशबुएँ नही अपनापन ढूंढने आती हूँ चाचा मेरा खोया हुआ करार ढूढने आती हूँ। पर हर बार बेचैनियां ले जाती हूँ "
इत्र की शीशियां शोकेस में जमाते हुए हुए चाचा के हाथ वही रुक जाते हैं वो हैरानी से लड़की की तरफ देखते हुए कहते हैं "मैं  कुछ समझा नहीं बेटा"
लड़की अपनी उदास आंखों से इत्र की शीशियों को ऐसे देखती है जैसे उनमें कोई उम्मीद छुपी हो, और फिर हाथ की घड़ी की तरफ देखती हुई हड़बड़ाहट में कहती है आज ज़रा जल्दी में हूँ चाचा अगली बार आउंगी तो सारी कहानी बताउंगी"इतना कहकर वो दुकान से बाहर निकल जाती है
काउंटर के इस पार खड़े चाचा मन में घुमड़ते हुए ढेरों सवालो को रोकते हुए इत्र की शीशियों को निहारते हैं और मुस्कुराते हुए मन ही मन सोचते हैं"अगले सप्ताह का इंतज़ार..."
कुछ दिनों बाद नूर इत्रवाले ने रोज की तरह ही अपनी दुकान खोली और एक छोटा काउंटरनुमा टेबल दुकान के मेन काउंटर से सटाकर बाहर की तरफ रख दिया इस टेबल पर कुछ सीधी के जैसे दिखने वाले शेल्फ बने थे नूर चाचा ने में काउंटर के दाहिने तरफ बने एक खाने ( खंड/शेल्फ) से लकड़ी के डंडे पर  मलमल का कपड़ा बांधकर बनाई हुई झटकनी उठाई और हल्के हाथों से काउंटर साफ करने लगे।
उनने एक एक करके इत्र के बड़े छोटे मर्तबान और शीशियां काउंटर पर जमाने शुरू कर दिए।साथ मर्तबानों पर लिखे इत्रों के नाम चेक करने लगे और जिन मर्तबानों पर नाम हल्का हो गया या उनकी चिट फटी हुई दिखी उनपर नई चिट लगाने लगे। ये उनका हर दिन का काम था जो वो बरसो से बिना नागा के करते आ रहे थे।उनके बारे में मशहूर था कि वो इत्र के जादूगर थे,इत्र की खुशबू भर से वो उसकी तासीर ,प्रकार,असर सब बता देते थे,लोग कहते थे नूर चाचा इत्र बेचते नही इत्र जीते आए हैं।
उन्होंने एक इत्र की शीशी हाथ में ली और जाने उनके मन में क्या आया कि उसे एक तरफ रख दिया और दुकान के नौकर मुन्ना को आवाज़ लगाते हुए बोले "मुन्ना आज ये चंदन वाला इत्र किसी को न देना देना हो तो अंदर के मर्तबान से निकालकर देना या न समझ आए तो मनाही कर देना "
मुन्ना ने हाथ घुमाते हुए चेहरे पर बड़ी ही हैरानी वाले भाव लाते हुए कहा "चाचा क्या बात हो गई कल ही तो ये इत्र इस मर्तबान में डाल कर रखा था आपने" चाचा ने बड़ी ही संजीदगी से जवाब दिया '"लगता है इस इत्र में कुछ बूंदे चमेली के इत्र की पड़ गई है " मुन्ना बड़े इत्मिनान से बोला चाचा आपकी परख की तो लोग कसमे कहते हैं पर आप भी जानते हैं इससे खुशबू में कोई खास फर्क नहीं आता फिर क्यों इतना महँगा इत्र एक तरफ रखना"
चाचा ने इत्र की शीशी एक तरफ रखते हुए कहा "कभी कभी फर्क खुशबू पर नहीं ईमान और ऐतबार पर पड़ता है और मैं अपने ईमान पर ,लोगो के ऐतबार पर कोई फर्क नही डालना चाहता"
मुन्ना चाचा की बात सुनकर मुस्कुरा दिया वो जानता था बरसों से चाचा ने इत्र बेचकर पैसे से ज्यादा इत्र का इल्म  और लोगो का ऐतबार कमाया है ये दुकानदारी का नहीं इत्र से इश्क़ का मामला है और इश्क़ में सौदे का क्या काम...
सोचते सोचते ही मुन्ना ने अपनी टेढ़ी हुई जालीदार टोपी सीधी की और बाहर वाले काउंटर पर इत्र की रंग बिरंगी कतारें जमाने मे चाचा की मदद करने लगा।
मुन्ना ने देखा कि आज चाचा ने इत्र की शीशियों को देखकर मुस्कुरा रहे हैं और न ही गुनगुना रहे हैं यह तक कि उनने चंदन के इत्र को देखकर गाया 'चंदन सा बदन चंचल चितवन' और न ही रजनीगंधा का इतर हाथ मे लेते हुए उनके होंठों में हरकत हुई " रजनीगंधा प्रेम तुम्हारा"...और तो और गुलाब का इत्र हाथो में आकर वापस शेल्फ में चला भी गया पर उनने नही गुनगुनाया "फूल गुलाब का लाखों में हज़ारों में चेहरा जनाब का.."मुन्ना का मुंह हैरत से खुला का खुला रह गया इतने सालों में उसने कभी ऐसा नही देखा था ...
मुन्ना ये तो समझ गया था कि चाचा खोए खोए हैं पर इस अनमनेपन की वजह से वो अनजान था आखिर उसने पूछ ही लिया " क्या बात है चाचा आज आप किसी और ही दुनियामे खोए दिख रहे हो " चाचा ने उसी अनमनेपन से जवाब दिया "हाँ इंतेज़ार कर रहा हूँ उस लड़की के लौट आने का" मुन्ना अवाक होकर बोला कौन लड़की चाचा? चाचा ने कहा "वही जो अपनी कहानी अधूरी छोड़ गई "फिर जैसे खुद ही बोले तुम नही जानते जाने दो इस बात को..मुन्ना भी सर हिलाते हुए वापस काम में लग गया...
ऐसे हर दिन इंतेज़ार करते हुए दिन बीतते जा रहे थे ना तो लड़की आ रही थी न चाचा के दिल को चैन आ रहा था
एक दिन चाचा ने दुकान खोली ही थी कि दूर से वो लड़की आती दिखाई दी नूर चाचा के चेहरे पर जैसे नूर लौट आया होंठों पर बच्चो की सी मुस्कुराहट तैर गई...वो दुकान के अंदर मुन्ना को आवाज़ लगाते हुए बोले"मुन्ना ये सुबह का काम ज़रा तू निपटा मुझे कुछ और काम करना है आज.....
मुन्ना ने अंदर से ही कहा ठीक है चाचा पर बात क्या है चाचा कुछ जवाव दे पाते उसके पहले ही वो लड़की दुकान तक आ गई और उसे देखते ही चाचा ने कहा "आ गई तुम बेटा"  और लड़की फीकी सी हँसी हँसते हुए बोली लगता है मेरा इंतेज़ार कर रहे थे आप? चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा "हां बेटा तुम्हारा भी और तुम्हारी इत्र की शीशियां खरीदने की वजह का भी"
लड़की ने पास ही रखा स्टूल अपनी तरफ खींचा और उसपर बैठते हुए बोली अच्छा तो आज इतर बाद में देखूंगी पहले आप मेरी कहानी ही सुन लीजिए शायद मेरी उलझन का कोई हल आप ही बता दें मुझे.."फिर कुछ सोचते हुए लड़की ने कहा पर एक बात का वादा करिए चाचा की मेरी कहानी सुनकर आप मेरे लिए कोई राय नही बनाएंगे क्योंकि आप अनजान नही पर इतने जाने पहचाने भी नही की मै आपको ये सब बताऊ पर क्योंकि आप इत्र का इल्म रखते हैं और ये कहानी सुनना भी चाहते हैं इसलिए मेरा दिल कहता है कि आपको बताने में हर्ज़ नहीं...। ये कहकर वो चाचा की आंखों में सवालिया निगाहों से देखती है और चाचा बस इतना कहते है  इत्मिनान रखो बेटी मैं ना तो तुम्हारे बारे में कोई राय बनाऊंगा और हो सकेगा तो तुम्हारी मदद भी करूँगा....

नैना ने लंबी सांस लेते हुए बोलना शुरू किया आदित्य नाम था उसका इंटरनेट पर मिला था हम दोनों के शौक मिलते थे हम दोनों को ही पढ़ने का शौक था वो कभी कभी कविताएं लिखता भी था ...जीवन से भरी हुई, प्यार से भरी हुई सतरंगी कविताएं और में उसकी लिखी कविताएं पढ़ती थी...अच्छा लगता था उसकी कविताओं में बंधी उम्मीद की पोटली को खोलना ऐसा लगता था जैसे जीवन को नए रंग मिल गए हों ,जैसे जीवन संघर्ष नही उत्सव है और इस उत्सव को उत्साह से मनाना ही इंसान के लिए सबसे ज़रूरी है  बस इसी सब के बीच उससे दोस्ती हो गई..इंटरनेट पर ही बातें होने लगी एक दूसरे के बारे में जानने का मौका मिला नैना दो मिनट रुककर कुछ सोचते हुए बोली आपको कुछ अलग लग रहा होगा ना ये सुनकर तो चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा नही नैना बेटा ऐसा कुछ नही ऐसी दोस्तियां हमारे ज़माने में भी हुआ करती थी पेन फ्रेंड होते थे उस ज़माने में और लोग ऐसे ही अनजान लोगों को खत लिखकर दोस्ती किया करते थे बस तरीका बदल गया अब नए जमाने मे. चाचा की बात सुनकर नैना मुस्कुरा दी और इस बीच चाचा ने 2 चाय का आर्डर भी दे दिया चाय की चुस्की लेते हुए नैना ने आगे कहा आदित्य से कई दिनों तक छोटी मोटी बातें होती रही पर धीरे धीरे बारें लंबी होती गई और जुड़ाव गहरा होता गया बातों बातों में ही पता चला कि इलाहाबाद का रहने वाला है वो बैंगलोर में एक फाइनेंशियल कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर था  । इलाहाबाद में बीते बचपन और गंगा नदी के सानिध्य का ही असर रहा होगा जो वो लिखने पढ़ने का शौकीन था और मेरा पढ़ने का शौकीन होना शायद मेरी  यहां भोपाल में हुई परवरिश का नतीजा है मैंने अपना सारा बचपन पुराने भोपाल के पटियों के किस्से सुनते और भोपाल मेले से लेकर, रविन्द्र भवन,गौहर महल छोटे बड़े तालाब के आस पास होने वाले मुशायरो को सुनकर बिताया।नैना की बातें सुनकर जैसे चाचा भी पुराने दिनों में खो गए और मुस्कुराने लगे नैना ने आगे कहा हमारी दोस्ती ऐसे ही बढ़ती जा रही थी कविताओं से शुरू हुई बातें कब सुख दुख की बातें बताने और फिर दिल धड़कने ,दिल की गिरहें खोलने तक जा पहुंची हमें पता ही नही चला हम दोनों एक दूसरे के लिए जुड़ाव महसूस करने लगे और ये धीरे धीरे हम दोनों की बातों में झलकने लगा।इंटरनेट से शुरू हुई बातें फ़ोन पर रोज़ होने वाली बातों में बदल गई शायद इश्क़ हमारी ज़िन्दगियों में चुपके से दबे पांव आने लगा था
बस हमने इज़हार नही किया था या शायद हम खुद ही उसके आने को महसूस नही कर पाए थे।
फिर एक दिन उसने मुझसे कहा कि वो अपनी बुआ के घर भोपाल आ रहा है 2,3 दिन के लिए क्या मैं उससे मिलना चाहूंगी और मैंने उसे हाँ कर दिया पर मैं उससे ज्यादा देर नही मिल सकती थी तो उससे कहा कि मैं  कॉलेज जाते समय उससे स्टेशन पर ही मिलने आ जाउंगी वो स्टेशन पर आया हम दोनों मिले थोड़ी देर बात करने के बाद हम दोनों अपने अपने रास्ते चल दिए। बस यही शायद वो समय था जब हमें इश्क़ का अहसास हुआ हमने अपने अपने दिल मे एक दूसरे के लिए प्यार महसूस किया जाने से पहले उसने एक बार और मुझसे मिलने के लिए पूछा और मैने भी हाँ कह दिया।
हम बड़े तालाब के किनारे बने रेस्टॉरेंट में मिले पिंक कलर के शर्ट में वो मुझे बहुत ही प्यारा और मासूम लग रहा था चश्मे के पीछे से झांकती उसकी गहरी नीली आंखें बेहद खूबसूरत लगी मुझे, तालाब के पानी का नीलापन जैसे उनमे उतर आया था उसने धीरे से मेरे हाथों को पकड़ते हुए कहा - नैना में तुमसे प्यार करने लगा हूँ  और अपनी सारी जिंदगी तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूँ क्या तुम ज़िन्दगी भर मेरा साथ देना चाहोगी?
मैं कुछ समझ नहीं सकी और बस इतना कह पाई की आदित्य प्यार शायद मैं भी करने लगी हूँ तुमसे पर मुझे सोचने के लिए थोड़ा टाइम चाहिए ।उसने धीरे से मेरा हाथ दबाया और मुस्कुराते हुए कहा तुम पूरा टाइम लो नैना ,ये ज़िन्दगी का सवाल है अच्छे से सोचसमझकर फैसला लेना क्योंकि प्यार कर लेना अलग बात है पर उसे निभाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है। एर उसने पूछा क्या एक चीज़ मांग सकता हूँ तुमसे ?मना तो नहीं करोगी मैंने आंखों में तैरते सवालों के साथ उसे देखा उसने कहा जाने से पहले एक बार तुम्हे गले लगाना चाहता हूँ उसके बाद तुम जो भी फैसला लोगों मुझे मंज़ूर होगा ।उसकी बात सुनकर मैं धीरे से उसके गले से लग गई ।उसके इत्र की खुशबू मुझे बेहद अच्छी लगी ऐसा लग जैसे बरसो से कस्तूरी की खुशबू के लिए भटकते हिरण को कस्तूरी मिल गई हो और उसी समय मुझे याद आया कि उसने कभी कहा था कि उसे इत्र का बेहद शौक है भोपाल के चौक बाजार से न जाने कितने ही इत्र उसने खरीदे थे और भी जहां जाता उस शहर में अगर इतर की कोई फेमस दुकान होती तो वहाँ से इत्र ज़रूर लाता था
नैना ने खोई खोई सी आवाज़ मे कहा वो अलग ही अहसास था जैसे मन की शांति का अहसास हो मैंने उसी समय आदित्य के साथ ज़िन्दगी बिताने के लिए मन बनाना शुरू कर दिया था ।बस फिर हम दोनों उस रेस्टॉरेंट से बाहर आए आदित्य ने जाते जाते एक बार मेरा हाथ अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा मुझे तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा नैना , मन तो हुआ कि कह दूँ की मेरा जवाब हां है पर जाने क्यों खुद को  ये सोचकर रोक लिया की 1,2 दिन में बता दूंगी।पहले खुद ज़माने से लड़ने और इश्क़ को निभा सकने के लिए तैयार हो जाऊं
आदित्य चला गया और मैं मन ही मन सोचने लगी कि कैसे उसे बताउंगी की में भी उससे प्यार करने लगी हूँ वो बंगलोर पहुंचा उस दौरान मेरी उससे बस एक बार बात हुई  वो मुझे बातों में बहुत खुश लगा उसने मुझसे पूछा भी की क्या नैन कुछ सोच पर मैन उसे कहा कि तुम घर पहुंचो टैब तुम्हे बताउंगी।फिर 2 दिन बाद मैंने पूरी तैयारी करके एक एक शब्द मन में रटकर उसे फ़ोन किया, काफी देर घंटी जाने के बाद जब कॉल रिसीव किया तो दूसरी तरफ से एक अनजानी आवाज़ ने कहा मैं समीर बोल रहा हूँ आदित्य का रूममेट हूँ आदित्य ने बताया था तुम्हारे बारे में इतना कहकर वो चुप हो गया मैंने बैचेनी से कहा है समीर तुमने फ़ोन क्यों रिसीव किया है आदित्य कहाँ है अच्छा ठीक हैं आदित्य से कहना नैना का फ़ोन था...
समीर ने रुआंसी आवाज़ में कहा मैं नही बात सकूँगा नैना बंगलोर आने के बाद टेक्सी से घर आते टाइम उसका एक्सीडेंट हो गया चोटें बहुत गहरी थी अस्पताल ले जाते हुए रास्ते मे ही..जाते वक्त उसके होंठो पर तुम्हारा नाम...ये कहते कहते वो फूट फूटकर रोने लगा...आगे उसने क्या कहा न तो मुझे सुनाई दिया और ना ही कुछ सुनने की मुझमे हिम्मत थी...ये कहते कहते नैना की आंखों में आंसू आ गए चाचा ने अपनी आंखों में आई नमी छुपाते हुए कहा या अल्लाह ये क्या किया तूने...नैना ने सुबकते हुए कहा वो  खुशबू अब भी मेरे साथ है चाचा सोते जागते वो खुशबू जैसे मेरा पीछा करती है रात दिन बस ये खयाल खाए जाता है कि काश मैंने उसके जाने से पहले अपने इश्क़ का इज़हार कर दिया होता काश उसे रोक लिया होता...
नैना की बातें सुनकर चाचा अचानक कुछ सोचते हुए कहते हैं तो इतने दिनों से तुम वो खुशबू ढूंढने यहाँ... नैना से आंसू पोंछते हुए कहा हाँ चाचा मैं पिछले चार साल से वो खुशबू ढूंढ रही हूँ न जाने कितनी दुकानों पर इतर ढूंढे पर वो खुशबू कभी नहीं मिली कभी नहीं..
चाचा ने पानी का ग्लास उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा नैना मत ढूंढो उस खुशबू को वो अब तुम्हे नही मिलेगी नैना ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा तो चाचा बोले हैं बेटा हर खुशबू हर इंसान पर अलग असर करती है कभी सोचा है गुलाब का वही इत्र कही मज़ार पर अलग महसूस होता है और हाथों में लेकर सूंघने पर अलग  और अलग अलग इंसानो पर अलग ऐसा क्यों? क्योंकि इंसान खुशबू नही चुनता खुशबुएँ इंसान चुनती है वो अपनी महक अलग अलग जगह अलग ढंग से फैलाती है..
ये खुशबुओं की दुनिया का उसूल है बेटा वो सबके साथ अलग होती है हर देह पर अलग, हर जगह पर अलग, हम ज़िन्दगी भर इस मुगालते में रहते हैं कि हमने खुशबू चुनी पर हम खुशबू नही चुनते खुशबू अपने अलग ढंग से महकने के लिए हमें चुनती है...
आदित्य के पास जो खुशबू तुम्हे महसूस हुई  वो सिर्फ इतर नही था उसमें उसका इश्क़ भी था उसकी रूह भी थी अब कोई इत्र उस प्रेमगन्ध को उस देहगंध को वापस नहीं ला सकता...उस खुशबू ने आदित्य को चुना था इसलिए वो गंध तुम्हारे मन में घर कर गई आज भी तुम उसे भूल नही सकी..
तुम उस खुशबू को मत खोजो अब ...क्योंकि वो अब वापस नहीं आ सकती जानता हूँ तुम भूल नही सकती पर अब छोड़ दो उसे आज़ाद कर दो उस रूह को, उस इश्क़ को...उस खुशबू को...क्योंकि आदित्य के साथ वो देहगंध जा चुकी हैं... ये सुनकर नैना ज़ोर ज़ोर से रोने लगी चाचा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा मुक्त कर दो बेटा उसे ,मत ढूंढती फिरो उस खुशबू को इसी में तुम्हारी भलाई है और आदित्य की रूह के लिए भी यही मुनासिब है...
जा चुकी खुशबू को ढूंढोगी तो दर्द के सिवा कुछ नही मिलेगा कुछ भी नहीं

Monday, September 19, 2016

अन्वित


बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूँ ..बेटे के लिए एक कविता लिखी है 

कितना सुन्दर है प्यारे बेटे तेरा इस जीवन में आना
शीतल कोमल पूर्ण चन्द्र सा मद्धम मद्धम मुस्काना
इस दुनिया के सब रिश्तों पर धीरे से भारी पड़ जाना
हौले हौले से मेरा सबसे प्यारा अन्वित (दोस्त) हो जाना

तुम मन के तारों में झंकृत हो साँसों में गुंजित हो  
सब बच्चे प्यारे होतें पर तुम ही एक मेरे शाश्वत हो 
टूटी तुतली बोली में कानों में धीरे से कुछ कह जाना
हौले हौले से मेरा सबसे प्यारा अन्वित(दोस्त) हो जाना

छोटे छोटे पैरों से जीवन की हर मंजिल चढ़ना
सुनना सबकी पर तुमको जो ठीक लगे वो ही करना
हँसते हँसते आगे बढ़ना खूब पल्लवित हो जाना
जो करना उस काम में सबके अन्वित (लीडर) हो जाना

तुम छोटे तुम बच्चे हो छोटी सी दुनिया तुम्हारी है
पर देखना सारी दुनिया जो सच में बहुत ही प्यारी है
हम भी गलत कहें ,रोकें तुम्हे तो अपनी बातों से समझाना
हम पीछे हट जाएँगे सच्ची,तुम हमारे अन्वित (लीडर)हो जाना   

सब माया है सब मोह है सब छोड़कर हमें जाना है
पर जब तक जीवन है तेरी मुस्कानों का फ़र्ज़ निभाना है
मुश्किल है इस रिश्ते का इस जन्म में सीमित हो जाना
मन को भाए तुमसे जन्मों का अन्वित(सम्बन्ध) हो जाना

जीवन की राहें मुश्किल है रास्तों में कितने रोडे है
दर्द के लम्हे ज्यादा है खुशियों के मौसम थोड़े हैं
मनका माला को जोड़ कर प्रेम का संचित हो जाना
हो सके तो धीरे से अपनेपन का अन्वित (रिश्ता जोड़ने वाला) हो जाना

दुनिया की अंधी दौड़ की होड़ में तुमको न झोकेंगे 
तू सोच समझकर मन से करना हम करने से न रोकेंगे 
दुनिया की नज़रों में उठकर क्या जीवन भर पछताना 
बस बेटा तू अपनी नज़रों में साबित हो जाना 
मेरे लिए मायने रखता है तेरा एक दिन अन्वित हो जाना 






 आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Tuesday, March 17, 2015

तेरे इस शहर के बच्चे मुझे बच्चे नहीं लगते

उतने मासूम नहीं लगते,उतने कच्चे नहीं लगते
तेरे इस शहर के बच्चे मुझे बच्चे नहीं लगते

जहाँ लगते थे मेले कभी गर्मी की छुट्टी में
उन जगहों को अब झूले अच्छे नहीं लगते

वो सिक्के जो बोए थे कभी नाना के बाग़ में
पूरी जेबें भरे नोट भी उन सिक्को से नहीं लगते

जो लोग दूसरों की गलतियों का तमाशा बना दे
अपने बच्चो के गुनाह माफ़ करे तो सच्चे नहीं लगते

मेरे शहर में लोग ऐसे ही थे जेसे इस शहर में है
लाख कोशिश करू ये लोग मेरे मन से नहीं लगते ...

वहां भी ऐसे घर थे, बाग़ थे दिन और रात थे
परदेस में ये सब भी अपने वतन से नहीं लगते

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Wednesday, March 4, 2015

दम लगा के हईशा :तुमसे मिले दिल में उठा दर्द करारा (dam laga ke haisha :movie review)

छोटा सा, शहर गंगा का किनारा, कुछ गलियां  इन गलियों से ही अन्दर की तरफ जाती और छोटी गलियां जिनके दोनों तरफ कुछ घर, बड़ी गलियों में कुछ दुकानें और इन दुकानों में कुमार शानू ...नहीं कुमार शानू खुद नहीं पर उनकी आवाज़ ...और हमारे साथ उस आवाज़ को सुनता आयुष्मान खुराना ...मतलब फिल्म का नायक प्रेम ...और गाना एकदम जबर "तू मेरे इम्तेहानो में" सच कहूँ सुनकर ऐसा  लगा जेसे “अरे कितने दिनों से ये मीठी आवाज़ नहीं सुनी थी , ऐसा  लगा जेसे ओह यार हमें पता भी नहीं चला की हमने इतने दिनों से क्या खो दिया था जो इस फिल्म ने दे दिया ....
मुझे बचपन याद आ गया केसेट रिकार्डिंग  की दुकानें याद आ गई वो लिस्ट याद आ गई जो हम केसेट वाले भैया को देकर आते है गाने भरने के लिए ....दिल का आलम मैं क्या बताऊँ तुम्हे एक चेहरे ने बहुत प्यार से देखा मुझे...., मेरा दिल भी कितना पागल है ...,एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ,,,,और भी न जाने क्या...

एक बडबोले शाखा बाबु जो खुद शादी करके मजे में है और प्रेम को सारे कुंवारों के महान कामों के उदहारण देते हैं   ,एक इंजीनियरिंग करके आया दोस्त जो तब तक पीछा नहीं छोड़ता जब तक बिचारे दसवी फेल प्रेम को मिठाई नहीं खिला देता अपने पास होने की,एक बुआ एक माँ , कुछ इधर उधर के लोग और एक कद्दावर मोटी बीवी जो सच में सारी छुईमुई हीरोइन वाली छवि को ध्वस्त करती है ....

प्रेम के पिताजी का कहना “ अरे कित्ती बार कहा है ये हैडफ़ोन लगाकर गाने न भरा कर  बीमार हो जाएगा , या दूकान में कुत्ता न घुस जाए ध्यान राखिओ”...जेसे उस ज़माने में लिए जाता है ..ऐसा लगता है यही सब तो होता था बिलकुल ऐसा ही तो सेम टू  सेम ....स्कूटर पर पीछे बैठी बीवी की चप्पल गिर जाना ,ससुराल से प्रेम का भूखा आ जाना और रस्ते में कचोरियाँ खाना , एक सिगरेट का दम भरना और जब संध्या ने कहा आप सिगरेट पीते हो तो बड़ा अकड़  के कहना "हां शराब भी पीता हु डरता थोड़ी हु किसी से" ...फिर धीरे से कहना "अच्छा ये बात घर में मत बताना" ...पति पत्नी के कमरे में जाने पर सास और बुआ का मुह दबाकर हसना ....पति का पत्नी से कहना अपनी पढाई का रोब न झाड़ो ....सब कुछ असा लगता है अरे एक दम सही ऐसा ही तो होता था डिक्टो .....

एक मिनट मुझे लग रहा है लिखते लिखते इतना खो न जाऊ की इस फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट ही लिख डालू ....तो कहानी बताना बंद करती हु वो आप लोग खुद देख आइयेगा पर इतना कह सकती हु ये फिल्म  सच में लम्बे समय के बाद प्यार की महक लेकर आई है ...ये मेट्रो वाला हाई फंडू प्यार नहीं है ,न गाव वाला दबा छुपा डरा घूंघट वाला प्यार ये ऐसा प्यार हे जो शादी से शुरू होता है दिखावे से त्रस्त  आदमी की मजबूरी से गुजरता हुआ तलाक तक जाता है और फिर साथ रहने की मजबूरी से फिर शुरू होकर , अपनेपन ,सपोर्ट की सीढियां चढ़ता हुआ एकदम्मी सच्चे सच्चे पक्के ,गंगा मैया की कसम टाइप प्यार तक जाता है ....

अच्छा वापस से कहानी बताना बंद करती हूँ... हाँ तो फिल्म देखते हुए बार बार लगा जैसे ये फिल्म दिल के उस कोने को छूती है जिसे छूने वाली लिस्ट में बहुत ही कम फिल्मों का नाम लिखा जा सकता है ... एक ऐसे नायक नायिका की कहानी जो अपनी अपनी कमजोरियां जानते हैं लड़का जानता  है वो कम पढ़ा लिखा है लड़की जानती है वो मोटी है सब कुछ परफेक्ट......
ऐसी फिल्म जिसे देखते हुए लगता नहीं की हम कही दूर बेठे हैं सब कुछ अपने आस पास होता दीखता है ,छोटी छोटी चालाकियां,चुहलबाजियाँ ,सब अपना सा लगता है ,एक सीधा सा लड़का जो अपने माँ बाप की बहु को रोक लेने की चालाकियों का खुलासा करता है ,एक पढ़ी लिखी लड़की जो चांटा मरने से भी नहीं डरती और जरुरत पड़ने पर साथ भी निभाती है प्यार करती है तो जताती भी है ...पर मॉड टाइप नहीं है भोली है पर आत्मसम्मान वाली है ...सब कुछ खुद में से गुजरता हुआ सा लगता है ...पता ही नहीं चलता फिल्म गुजर रही है या हम फिल्म में से होकर गुज़र गए....

कुछ रूहानी नहीं ,कुछ कानफोडू नहीं,कोई ड्रामा नहीं ,कोई धमाल नहीं,शादी के ताम झाम नहीं सब कुछ सिंपल और यही चीज़ इस फिल्म को सबसे अलग बनाती है साथ में एक सोशल मेसेज भी की खूबसूरती सिर्फ शरीर से नहीं होती और प्यार इस सब बहुत ऊपर की चीज़ है ..पर कही भी ये मेसेज थोपा हुआ नहीं लगता क्यूंकि इसे किसी आदर्शवादी ढंग से नहीं दिखाया धीरे से बीज बोया गया धीरे धीरे फलने दिया गया ...कोई ज्ञान नहीं आराम से पनपता हुआ प्यार ....

आयुष्मान और भूमि दोनों की एक्टिंग जबरजस्त ,सारे चरित्र अभिनेता अभिनेत्री या साइड एक्टर्स इतनी स्वाभाविक एक्टिंग करते हुए दीखते हैं जेसे कोई दम नहीं लगाया गया हो सब उनकी खुद की भावनाएं है ... ये फिल्म चोपड़ा केम्प ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे जेसे बड़े केनवास पर नहीं बनाई पर यकीन मानिये इसके रंग उतने ही बेहतरीन है ...राइटर ने बारीक बारीक चीज़ों का ध्यान रखा है और देखकर असा बिलकुल नहीं लगता जेसे राइटर कोई हाई फंडू पेंटिंग बना रहा था ऐसा लगता है जैसे गावों में तीज त्योहारों पर बनाया हुआ मांडना है जिसमे हर चीज सही जगह पर होना ही उसे सबसे बेहतरीन बनाता है ....और कुमार सानु के गाने इस मांडने को बनाते हुए गए जाने वाले लोकगीत ...

फिल्म के लास्ट में एक गाना है तुमसे मिले दिल में उठा दर्द करारा , शूटिंग कपडे सब देखकर लगता है हम पुरानी (ज्यादा पुरानी  नहीं गोविंदा वाली ) फिल्मों के दौर में हैं....और सबसे बड़ी बात फिल्म जब ख़तम होती है तो लगता है अरे ये खत्म क्यों हो गई और बहार निकलते ही पहले शब्द इसे तो एक बार और देखूंगी ...अरे असा नहीं की मुझे समझ नहीं आई एक बार में J बस ये वो फिल्म है जिसे मैं बार बार देख सकती हूँ...

 हाँ बस जब फिल्म देखने गई तब ये दुःख जरूर हुआ की यशराज ने इस फिल्म का थोडा और प्रमोशन क्यों नहीं किया और अच्छे पोस्टर्स क्यों नहीं बनवाए क्यूंकि इस फिल्म को तो सिर्फ डायलोग ,सिर्फ आस पास की घटनाओं के लिए भी देखा जा सकता है ....उस दिन थिएटर खाली थे पर फिल्म के चलने की खबर से में खुश हूँ कुछ फिल्में माउथ पब्लिसिटी से ही चमकती है ....
 

अरे हाँ एक बात और भूमि इसमें सच में प्यारी लगी है 

(रिव्यू कैसा लगा बताइयेगा ):)